Friday, June 18, 2010

भारत देश में नेताओं की सोंच

जिस दिन अपने देश के नेता यह सोचने लगेंगे की उन्हें जनता ने किस लिए चुनकर भेजा और वे कर क्या रहे हैं यह गारंटी है की वो जो आज कर रहें वैसा नही करेंगे आज केवल ये नेतागण एक दुसरे पर दोषरोपण के सिवा कुछ नहीं कर रहे हैं चाहे मामला नक्सालियों का या मामला भ्रस्टाचार का हो या रोजगार गारंटी का हो या किसानों का हो क्या सत्ता पक्ष क्या विपक्ष सब सिवाय एक दुसरे की गलतियों को उजागर करने के सिवा कुछ नहीं कर रहें हैं क्या हमें आजादी इसीलिए मिली थी की हम वापस अपने देश के नेताओं के गुलाम बन जाएँ वे पार्लियामेंट में बैठकर जो मर्जी फैसला बना ले योजनाये बना ले और जनता मात्र मूकदर्शक रहे क्योंकि उनका धौंश यह है की वे चुनकर आये हैं, जनता ने उन्हें चुना है जबकि जमीनी हकीकत यह है की दिनोदिन वोट का प्रतिशत गिरता जा रहा है लोगों को चुनाव से अब कोई लगाव नहीं क्यूंकि आम आदमी की हालत दिनोदिन बद से बदतर होती जा रही है केवल सरकारी कागजों पर आंकड़े वह भी झूटे दिखाए जा रहें उनका जमीनी हकीकत से कोई लेना देना नहीं है न्यायब्यावास्था भी लोगों को न्याय दिलाने में अक्षम रही है गरीब पिस रहें है उनको वर्षों इन्तेजार के बाद भी न्याय नहीं मिलता रसूक वाले आमिर लोगों ओहदे वाले लोगों के पक्ष में ही भारत की अदालतें काम कर रहीं हैं उनको कोई जवाबदेही है ही नहीं किसी केश में चाहे कितना भी समय लगा दे उनको कोई पूछनेवाला नहीं है क्या अपना संविधान इसी तरह लिखा गया है की केवल आमिर ही इस देश में जीने का हक़ रखते है गरीबों को अपने हाल पर छोड़ देना ही चुनी हुयी सरकार का काम है योजनायें बहुत ही लाभकारी बनती हैं पर उन पर कार्रवाई हो रही है लोगों को लाभ पहुच रहा है या बीच में कोई खा जा रहा है इस मसले को सुलझाने के लिए आजतक कोई कदम सरकार ने नहीं उठाये बस देशवासियों को भ्रस्टाचार का हवाल देकर उन्कोआस्वस्थ कर देना ही क्या सरकार का काम है कभी तो कोई सुझाव या तो मंत्रिगन या तो कोई इमानदार नेता देश के समक्ष लाये और जनता के दुःख दर्द को दूर करने का उपाय लाये या सुझाये शायद तब जरुर अपने देश के गरीबों का भला हो जाये और उनकी जिन्दगी में भी खुशहाली के कुछ पल आ जाये आशा एवं विश्वाश के सात मैं ये शब्द लिख रहा हूँ शायद किस नेता की नजर इस पर पड़े और गरीबों का भला हो सके सबसे बड़ी जरुरत जवाबदेही निश्चित करने की है इस पर सरकार संजीदगी से सोचना चाहिए और कानून केवल बनाया ना जाये उनका पालन भी हो इस को सुनिश्चित किया जाये
अशोक कुमार दूबे द्वारका नयी दिल्ली ७५

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